Sunday , 22 January 2017
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Satire (व्यंग्य)

महाराज ! कालाधन ही चाहिए

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एक बार भोलू पहलवान समुद्र मंथन से निकले धन्वन्तरि को अपने घर ले आया हालंकि जो कलश धन्वन्तरि लिए हुए थे। वो देवताओं में पहले बँट चुका था , पर उसे संतोष था कि कुछ अमृत पात्र से चिपका है इसलिए घर लाने के बाद आसन पर विराजमान कर धन्वन्तरि को प्रणाम किया चूँकि देवताओं के वैध है इसलिये धन्वन्तरि ने पूछा ‘वत्स कैसे याद किया और क्या प्रयोजन है यहाँ लाने का । भोलू पहलवान की आवाज में दयनीयता थी , “महाराज चालीस दशक बीत गये कुश्ती लड़ते – ... Read More »

उत्तर प्रदेश – जुगाड़ बनाओ, पुरस्कार पाओ

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– लेखक, डाॅ. डीएम मिश्र अपने को नवोदित कवि -शाइर बताने वाला यूनुस , बाहुबली अहमद से कह रहा था – भाई जान मुख्यमंत्री आवास तक आप की इतनी बड़ी पहुॅच है । स्वयं सपा मुखिया आपके कद्रदान हैं । लाखेा वोट आपकी मुट्ठी में हैं । आप जो चाहे करा सकते हैं । फिर मुझे भी एक ‘‘साहित्य- शिरामणि’’ का पुरस्कार दिलवाने में क्या दिक्कत । कुछ न हो तो यशभारती या भारत- भारती से भी काम चल जायेगा या उर्दू अकादमी से लाइफ-टाइम एचीवमेंट ही दिलवा दें । ... Read More »

जिंदगी का हर दिन

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जिंदगी का हर दिन एक त्यौहार था , बिना मोबाइल के ही एक दूजे के दिल का दारोमदार था । चिड़ियों की आवाज से दिन का निकलना तै था , वो कितने अच्छे दिन थे जब आँखों में सच्चे पर सपनों का संसार था । वो नानी का आँगन , वो अपनों की डांट । वो बारिश में भीगना , अनजानी पर सच्ची खुशियों के साथ था । खो गयी वो सखियों के संग झूलों की यादें , खो गयी वो प्यार भरी बारिश की यादें । आज सिर्फ तन्हाई ... Read More »

ज्योतिष

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ज्योतिष पूजा पाठ आज बन गया अखाड़ा, जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसा हो गया नजारा । चार किताबें पढ़कर भविष्य आपका बताते हैं , अपने कल की खबर नहीं ,लोगों का भविष्य बताते हैं । कोई सुनाये लाल किताब ,तो कोई पीली बांचता है , लोगों से लेकर मोटी रकम अपनी तिजोरी भरता है । पढ़ लिखकर भी बने अन्धविश्वासी ,कोई इन्हें समझाए । जीवन है उस शक्ति के हाथों कोई तो राह दिखाये । टीवी में मिल जाते है कैसे सच्चे पंडित , हमें नहीं मिला आज तक जो ... Read More »

बूढ़ी ख्वाहिशें

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बुजुर्ग होते हैं इस दिल में, किशोर, शोर मचाये है गंभीरता के मुखौटे के पीछे मन बावरा मुस्काये है उजड़े चमन सी जिंदगी में ,दोबारा बहार चाहते हैं आद्रता भरे इस नीरस मौसम में, ठंडी बयार चाहते हैं हाय, यहां, उम्र है कि दिन पे दिन, बढी़ जा रही है और ये बेशरम, अँखियाँ फिर भी लड़ी जा रही है.. श्रीमती जी की अपेक्षा और उपेक्षा से जिंदगी सुनसान है बोर घर गृहस्थी में नून तेल लकड़ी का बड़ा घमासान है उफ्फ, कानों की कनौती, खिजाब को चिढ़ाती है हर ... Read More »

स्त्री क्या पहने

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नारी वस्त्रों के ऊपर अक्सर बहस उठती है तब कुछ विरोधाभासी बातें मेरे मन को चुभती हैं इस तर्क को मानूं भी तो कैसे जब सलीके से दुपट्टा ओढ़े साड़ी से तन छुपाए लड़की भी सुरक्षित नहीं है पुरुष का पाश्चात्य पहनावा आवश्यकता है समय की परन्तु स्त्री के पहनते ही संस्कृति की चूले हिलने लगती हैं यदि खुला शरीर ही वासना को जगाता है तो माँ का उघड़ा तन देखकर भी पुत्र केवल पुत्र ही क्यों रह जाता है बहन का आँचल सरकते ही जो आँखें दिशा बदलती हैं ... Read More »

नारी

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नारी को इंसान नहीं , प्लास्टिक की गुड़िया , समझती है दुनिया । वह भी शायद , बेजान गुड़िया होती जा रही है । तभी तो असहनीय बातों को भी , आज तक सहती आ रही है । कहीं दहेज़ की आग में , सदियों से जलती आ रही है । कभी विधि के हाथों बन खिलवाड़ , जीवन को ढोती जा रही है । गृहस्थी के बोझ तले दबी , अपने में हजारों प्रतिभाएं समेटे , घरों में बस रहती जा रही है । बढ़ा दे ,आज कदम प्रगति ... Read More »

धर्म और आतंक

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ये कैसी शिक्षा है भाई आतंकी उदघोष हो गया पाकिस्तानी राजनीति में अफजल गुरू भी बोश हो गया गुरूकुल और मदरसे भी आतंकवाद को पनपायेंगे इस शिक्षा से कौम, कबीले, मजहब ही छनकर आयेंगे प्रेम, अहिंसा, सत्य, तथ्य की बुनियादें अवशेष हो गयी ईसा, मूसा, राम, कृष्ण की दुनियां से तालीम खो गयी क्या कूरान की आयत से अब फतवे ही छनकर आयेंगे वेद, शास्त्र, गीता, रामायण हिंसा करना समझायेगे हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई धर्म, मजहब ही बन जाते हैं मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे भी सम्प्रदाय काे ही गाते हैं सारी ... Read More »

मुहल्ले की चार औरतें

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एक समाज दबे पांव समाज के अंदर भी पनपता है यकिन मानों ये लघु समाज और भी ज्यादा घृणित और निर्दयी है…… चार घर की चार महिलाएं बैठकर निर्णय करती हैं किसी बेटी और बहु के चरित्र का और पहना देती हैं तमगा किसी भी लड़की को बत्तमिज और चरित्रहीन होने का किसी के घर की सब्जि पर पडे छौंक की सामग्री तक की जानकारी रखती हैं ये और समय आने पर बातों में मसाले और गर्म मसाले डाल कर परोस देती हैं किसी के भी सामने ये वहीं चार ... Read More »

‘वो लोग कब बदलेंगे’

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साल बदल रहा है पर वो लोग कब बदलेंगे… “जो मानव जाति का बुरा सोचते हैं !” वो लोग कब बदलेंगे जो किसी बहन-बेटी पर फब्तियाँ कसने के लिए रास्तों पर घात लगाये बैठे रहते हैं ।” वो लोग कब बदलेंगे…. “जो इक मासूम को पैदा होने से पहले गर्भ में ही नोंच देते हैं” वो लोग कब बदलेंगे…. जो आये दिन आतंक फैलाये रखते हैं ।” वो लोग कब बदलेंगे…. जिनकी कामुक सोच उन्हें बलात्कारी बना देती है । वो लोग कब बदलेंगे…. “जो खाकी की शान को धूमिल ... Read More »