Sunday , 22 January 2017
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Story (कहानी)

वफा

saroj-singh

आराम कुर्सी पर ऊँघती हुई शाहीन मोबाइल की रिंग से चौंक उठी .. ओह नफीस आ गए सोचती हुई दरवाजा खोलने लगी …. नफीस ने कमरे में आ कर जूते उतारे और .. वाशरूम में जा घुसा … रात के २ बज रहे थे … माँ की नींद न खुले इसलिए डोरबेल बजाने के बजाय फोन करता था नफीस …! उसके बिहर इने तक खाना लगा चुकी थी शाहीन …लेकिन भूख नही है कह कर वो बिस्तर में आ गया और सोए हुए एक वर्षीय बेटे के पास लेट गया ... Read More »

काजल, (नौंवा व अंतिम भाग)

kajal

पारखी और पैनी नजर वाली सासू मां लगभग चीखते हूये बोली, “ज्यादा उड़ने वाली औंधे मुहं गिरती हैं उस सोनिया की तरंहा”! काजल के कानों में, सासु मां की वही बात गुंज रही थी, उस बात से उसका दिमाग नही हट रहा था, काजल में नजर आते परिवर्तनों पर ताना कसा होगा उन्होनें शायद! उन्होंने उस पड़ोसन सोनिया का जिक्र किया था, जो हेंडीकेपट पति और और दो छोटे छोटे बच्चों को छोड़कर हीरोनुमा किरायेदार के साथ उसके गांव भाग गई थी, बाद में प्यार में उद्धार करने के कसमें ... Read More »

काजल (भाग – 8)

kajal

“काजल, तेरे लिपस्टिक का शेड, लाईट से डार्क हो गया, हाय…. गजब लग रही हो यार” सहकर्मी और सहेली, सुरेखा ने चुटकी ली और लेती भी क्यों नहीं. मिस्टर सिहं से हूई छोटी सी पर सार्थक मुलाकात के बाद, अगले दिन सुबह आफिस में जब काजल ने मुस्कराते हूये प्रवेश किया तो उसके गालों पर कल की मुलाकात का ग्लो साफ नजर आ रहा था, गालों में पड़़ते गड्ढे मुस्कुराने से और गहरा गये थे, “गुड मॉर्निंग एवरीबडी “आज काजल की आवाज में खनक थी, काजल की हमेशा गंभीर रहने ... Read More »

काजल (भाग – 7)

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“उफ्फ…यह मुझे क्या हो रहा है ? मैं क्यों एक दुसरे आदमी के बारे में सोच रही हूँ ? लेकिन मिस्टर सिंह कितने शरीफ और आकर्षक हैं ” काजल, रात भर करवटें बदलती रही, रह रह कर आंखो के आगे मि. सिहं का चेहरा घूमे जा रहा था, ये बैचेनी, काजल,के नीरस मन में नये नये प्यार की उम्मीद के कारण थी, साथ ही क्षोभ भी हो रहा था कि विवाहिता होने के नाते के मन में पराये पुरूष के लिए ऐसा भाव लाकर, वो गलत कर रही है ! ... Read More »

काजल (भाग-6)

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घड़ी पर काजल ने नजर डाली, पांच बजने वाले थे. काजल आज, आफिस से वापसी में , बस स्टॉप के पास वाले कॉफी होम में मि. सिहं से मिलने वाली थी , काजल बहुत डरा हूआ सा महसूस कर रही थी उसे लग रहा था जैसे वो अपराधी हो, काजल को तो कुछ करे बगैर भी हमेशा अपराधबोध होता ही था! होता भी कंयो ना, बचपन से ही काजल को सदा खुद में अवगुण देखने के लिये ही ट्रेनिंग मिली थी, सबने उसमें कमियां ही तो निकाली थी आज तक.. ... Read More »

काजल (भाग – 5)

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माथे पर आई लट को उंगली में लपेट, छल्ले बनाती बिगाड़ती, काजल ने एक लंबी गहरी सांस ली.. “ शुक्र है कि काम समय पर समाप्त कर सकी . अब चैन से घर जा सकुंगी “ काजल अपने- आप से ही बातें कर रही थी . उसने अपने बैग के सामान उनके उचित स्थान पर रखने के बाद एक बार फिर अपने किये गये काम के विषय में सोचा और फिर संतुष्ट भाव से ऑफिस से निकल पड़ी. बस- स्टॉप पर पहुँच कर बस के इंतज़ार के अलावा उन अजनबी ... Read More »

काजल… ( भाग – 4 )

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“भोर भये पनघट पे मोहे नटखट श्याम…….” गीत गुन – गुनाते हुए काजल बाथरूम से नहा- धो कर निकली . उसने सुबह कर, घर के सारे काम निपटा कर, आफिस जाने के लिये तैयार होने के लिये के काजल अब शीशे के आगे खड़ी होकर खुद के अक्स को निहार रही थी, आज पता नहीं क्यों उसे खुद पर ही प्यार आ रहा था . ऐसा क्यों हो रहा था , यह उसे भी नहीं मालूम था. उसने अपनी ही काया को ध्यान से देखा और एक लाज की लाली ... Read More »

खूनी तारीख 26/11

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रघुनाथ आँखों पर चश्मा चढ़ाकर अखबार में नजरे गड़ाए हुए थे। हाथों में चाय की प्याली लिए पिँकी आई और बोली-“नाना जी! गुड मॉर्निँग, लीजिए गरमागरम चाय पीजिए।” रघुनाथ ने अखबार से नजरें उठाईं तो पिँकी चौकते हुए बोली-“क्या नाना जी!आप रो रहे हैं,क्या हुआ?” “बेटी!आज 26नवंबर है और आज ही के दिन तेरे मम्मी- पापा आतंकवादी हमले में मारे गए थे। उन्हीं को याद करके आँसू निकल आए।” पिँकी फफककर रो पड़ी और नाना के गले से लिपट गई। – पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’   Read More »

बोहनी

kapil-shastri

पाँच सौ हज़ार की नोटबंदी के बाद नई अर्थव्यवस्था के जन्म की तकलीफ सबसे ज्यादा निम्न और मध्यमवर्ग ही सह रहा था फिर भी काला धन जमा करने वाले देश के गद्दारों के खिलाफ इतना रोष था कि सरकार की इस मुहीम का सब स्वागत कर रहे थे। ऐसे में एक मध्यमवर्गीय परिवार की गृहणी मालती भी सब्जियां न खरीदकर घर में ही बचे खुचे दाल चावल ही बना रही थी।पति सुधीर भी जब दो घंटे एटीएम की लाइन में लगकर खाली हाथ लौट आया तो अचानक ही आठ वर्षीय ... Read More »

वो पहला प्रेमपत्र

poornima

आज मीतू का संयम जवाब दे चुका था,भूख के मारे आंतें कुलबुला रही थीं वो अन्दर-बाहर करते करते थक सी गयी ! जवानी की बात और थी,पर अब सहनशक्ति कम हो गयी है ! मीतू कहती रह गयी,” एक परांठा खा जाओ,पता नहीं कितनी देर लगेगी …” पर उसकी सुनता ही कौन है ?” ” मैं बस दो घंटे में वापिस आता हूँ फिर दोनों साथ बैठकर खायेंगे !” और अब चार घंटे से ज्यादा हो चुके गए, वो खाकर जाते तो … समय बिताने को अलमारी साफ़ करने बैठ ... Read More »