आवरण

आवरण कितने गाढ़े, कितने गहरे
कई कई परतों के पीछे छिपे चेहरे
नकाब ही नकाब बिखरे हुए
दुहरे अस्तित्व हर तरफ छितरे हुए
कहीं हंसी दुख की रेखायें छिपाए है
तो कभी अट्टहास करुण क्रन्दन दबाए है
विनय की आड़ लिये धूर्तता
क्षमा का आभास देती भीरुता
कुछ पर्दे वक़्त की हवा ने उड़ा दिये
और न देखने लायक चेहरे दिखा दिये
आडम्बर को नकेल कस पाने का हुनर
मुश्किल बहुत है मगर
कुछ चेहरों में फिर भी
बेधड़क नग्न रहने का साहस है
बिना कोई ओट ढूंढे
सच कहने का साहस है
उन्हें आवरण जंचा नहीं
या कि लगाना नहीं आया
जो भी हो उन्हें खुद को
छिपाना नहीं आया
उनमें साहस की हर लकीर सच्ची है
और अच्छाई सचमुच में अच्छी है
उन्हें पढ़ पाना एक दम सहज है
क्योंकि वहां अंकित हर भाव सजग है
पर भीड़ से छिटककर अकेले चलना बड़ा जटिल है
अतः आँखें मूंद भीड़चाल चलना सुहाता है
आवरण ,मुख़ौटे, नकाब रक्षाकवच की मानिन्द
चेहरे पर ओड़े हुए हमें छिपना भाता है
आवरण कितने गाढ़े,कितने गहरे
कई कई परतों के पीछे छिपे चेहरे ।

tanuja

– तनूजा उप्रेती

 

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