Sunday , 26 February 2017
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उदासी मुफलिसी वीरानियाँ सब एक खाने में

imgउदासी मुफलिसी वीरानियाँ सब एक खाने में ।
ख़ता कर दी है शायद रब ने यूँ दुनिया बनाने में ।

नहीं महफूज़ इज्जत प्यार और ईमान है यारों
बड़ी मुश्किल सी है देखो यहाँ इक घर सजाने में ।

कठिन होता बहुत हर रोज की रोटी कमाना भी
हमें तो सिसकियाँ और झिड़कियां मिलती हैं खाने में ।

कहाँ अस्मत कहाँ इज्जत कहाँ की ख्वाहिशें यारों
बड़ी है बेबसी बेटी को इस घर में छिपाने में ।

हमारी गुरबतों के हाल पर हँसते हुए देखो ।
मजा आने लगा कितना उन्हें छप्पर जलाने में ।

गरीबी भूख लाचारी है और महँगाई ऊपर से ।
कमी बाकी बची है क्या अजी हमको सताने में ।

कभी आवाज ऊँची हो गयी तो सबने कह डाला।
ये शातिर चोर जालिम हैं इन्हें ले जाओ थाने में ।

वफायें प्यार चाहत और उल्फ़त के हसीं लमहे
भरी हैं आज ये आँखे तुम्हे किस्सा सुनाने में ।

yougendra

– योगेन्द्र पाठक
आगरा

 

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