Wednesday, 29 March, 2017

शक्ल रखता वो पारसाई है

शक्ल रखता वो पारसाई है,
सच तलक अपनी कब रसाई है।

फैंक कर जाति धर्म का पासा,
मार डालेगा ये कसाई है।

पास इनको न अपने आने दो,
इन वज़ीरों में हर बुराई है।

भूख से मर रहे किसान सुने,
शय यही हिस्से तेरे आई है।

कह गयी सब मगर सुनी ना गई,
बेबसी चेहरे पर जो छाई है।

नगर ओ गावँ सब हैं वीराने,
ये जमीं दीमकों ने खाई है।

ले के सिरहाने सोयें हम कब तक
रात हर रोज जो भी पाई है।।

alka-jain

– अल्का जैन “शरर”
(पारसाई- नेक, रसाई- पहुँच, वज़ीर- मंत्री, शय- वस्तु)

 

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