उठे हैं सर नई गुस्ताखियों के

उठे हैं सर नई गुस्ताखियों के
अहद लेने हैं ज़िम्मेदारियों के

कई बैक्टीरिया पनपे अचानक
ज़हन भी घर बने बीमारियों के

जहाँ देखो दिखाई दे रहे हैं
घने जंगल खड़े लाचारियों के

बना कर रख दिया पहले अपाहिज़
दिए हैं तोहफे फिर वैसाखियों के

मुखालिफ भी खड़े होने लगे हैं
नए चेहरे कई खुद्दारियों के

ये माना ज़ुल्म ताकतवर हुआ है
बढाओ कद नई तैयारियों के

sugam

सुगम

 

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