Sunday , 22 January 2017
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जीवे सें मन कितै भरत है

sugamदिन ऊंगत है रोज़ ढरत है
साल जात का देर लगत है

सुख के दिना अगर होवें तौ
सालन कौ नईं पतौ चलत है

दुःख कौ समऔ कठन है भैया
बज्जुर बैरी जान परत है

हंस कें झेलौ सुख तकलीफें
जीवन में सब लगौ रहत है

माया मोह होत है ऐसौ
जीवे सें मन कितै भरत है

सुख हम भोगें दुःख को सैहै
बात सुगम खूबई समझत है

– सुगम

 

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