आसपास के लोग मुझसे परेशान बहुत है

आसपास के लोग मुझसे परेशान बहुत है
कि मेरी रूह में अभी बाकी ईमान बहुत है

काजल तक भी दाग लगा न सका मुझे
मेरी शख्सियत पर वह भी हैरान बहुत है

पत्थर पत्थर रखने से बनती है बड़ी इमारते
मगर झटके में उसे गिराना आसान बहुत है

बैठ जाता हूं हारकर तो रूठ जाती है
मेरी मंजिल अब तलक नादान बहुत है

हजारों दुख दिए पर हंस कर गले लगाती है
मां मेरी मुझ पर मेहरबान बहुत है

मेहनतकश मजदूर को सौ बार मरते देखा है
कौन कहता है इस शहर में धनवान बहुत है

ऐ खुदा! तू मेजबान है, हिसाब करना सबका
इस जमीं पर तेरे घर के मेहमान बहुत है।

– राम लखारा ‘विपुल’

 

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Comment

  • SHAILAJHA FATEHCHAND

    August 8, 2015

    LIKE AND MEANING FULL LINE SBUT ONE WORD SPOIL EVERY THING DOSN’T FIT WITH YOUR PHOTO SAY OR U’R IMAGE “IS WORD KHUDA “NO BASULATELY NOT FEEL LIKE YOU STOLE FROM SOME ONE WHY NOT ISHWAR ?BUT ACTUALLY GREAT !

     
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